सामाजिक समरसता के पुरोधा पं. दीनदयाल

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर, 1916 को उत्तर प्रदेश की पवित्र ब्रजभूमि मथुरा में नगला चंद्रभान नामक गांव में हुआ था। बचपन में एक ज्योतिषी ने इनकी जन्मकुंडली देख कर भविष्यवाणी की थी कि आगे चलकर यह बालक एक महान विद्वान एवं विचारक बनेगा, एक अग्रणी राजनेता और नि:स्वार्थ सेवाव्रती होगा मगर ये विवाह नहीं करेगा। उनका राजनैतिक विचार अंत्योदय है और जीवन दर्शन एकात्म मानववाद है।

एकात्म मानवदर्शन पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित एक अद्वितीय सामाजिक और आर्थिक दर्शन है, जो भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर एक संतुलित समाज की परिकल्पना करता है। यह दर्शन पश्चिमी आर्थिक और राजनीतिक विचारधाराओं के विरोध में, भारतीय समाज के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है, जो समाज, व्यक्ति, और प्रकृति के बीच समन्वय और संतुलन पर आधारित है। एकात्म मानवदर्शन प्राचीन वैदिक अद्वैतवादी अवधारणा है। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का मत है कि व्यक्ति परिवार समाज राष्ट्र से लेकर परमेष्टि के मध्य एकात्मता है। छोटे से जीव से लेकर सम्पूर्ण परमेष्टि को दुख न देकर उसके कल्याण का भाव एकात्म मानववाद है। व्यक्ति अपनी माता और पिता के व्यक्तित्व का विस्तार होता है ।माता-पिता, भाई-बहन पत्नी और बच्चों को मिलाकर परिवार बनता हैं। पड़ोसी, रिस्तेदार, मित्र, सहपाठी और सहकर्मी आदि से मिलकर समाज बनता है।

एक तरह के लोगों के समाज होता है। अनेक परिवारों से समाज बनता है। कई समाज भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से मिलकर एक राष्ट्र का निर्माण करते हैं। देश विशुद्ध रूप से भौगोलोक इकाई है जबकि राष्ट्र भौगोलिक के साथ साथ सांस्कृतिक इकाई है। नदियों पर्वतों वृक्षों और देश को जीवन्त मानकर श्रद्धा भक्ति का भाव होना राष्ट्रीयता है। भारत एक राष्ट्र है और भारत माता के प्रति श्रद्धा राष्ट्रीय अभिव्यक्ति है। अनेक राष्ट्र मिलकर एक विश्व बनाते हैं। हमारी पृथ्वी हमारा विश्व है। एकात्म मानवदर्शन में व्यक्ति और समाज के बीच गहरे अंतर्संबंध को समझाया गया है। उपाध्याय जी के अनुसार, व्यक्ति और समाज एक दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। व्यक्ति समाज का हिस्सा है और समाज व्यक्ति के विकास के लिए आवश्यक आधार प्रदान करता है। इसलिए, व्यक्ति और समाज का विकास एक साथ होना चाहिए। यह दर्शन भारतीय परंपराओं में वर्णित चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – पर आधारित है। उपाध्याय जी के अनुसार, जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक समृद्धि (अर्थ) या इंद्रिय सुख (काम) प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह धर्म और मोक्ष की प्राप्ति के साथ संतुलन में होना चाहिए। व्यक्ति का विकास केवल भौतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी होना चाहिए। समाज के विभिन्न अंगों – आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक – के बीच संतुलन आवश्यक है। एकात्म मानवदर्शन के अनुसार, यदि समाज का कोई एक अंग असंतुलित हो जाता है, तो पूरा समाज अव्यवस्थित हो जाता है। उदाहरण के लिए, केवल आर्थिक विकास पर ध्यान देने से समाज में असमानता और नैतिक पतन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है ।

एकात्म मानवदर्शन में स्वदेशी पर जोर दिया गया है, जिसका अर्थ है कि आर्थिक और सामाजिक नीतियों का निर्माण देश की पारंपरिक आवश्यकताओं, संसाधनों, और संस्कृति के आधार पर किया जाना चाहिए। आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन को समाज की समृद्धि के लिए आवश्यक माना गया है। इस दर्शन में मानव जीवन के हर पहलू को एक समग्र दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। उपाध्याय जी का मानना था कि पश्चिमी दर्शन में व्यक्ति को केवल भौतिक आवश्यकताओं तक सीमित किया जाता है, जबकि भारतीय दर्शन में व्यक्ति को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का एक पूर्ण रूप में देखा जाता है। इस प्रकार, व्यक्ति का विकास समग्र रूप से होना चाहिए। सूर्य की परिक्रमा करने वाला सौर परिवार हमारी सृष्टि हैं। हमारे सूर्य जैसे हजारों सूर्य अपने अपने सौर परिवार के साथ किसी महासूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं, और हजारों महासूर्य अपने अपने सौरमण्डल के साथ जिसकी परिक्रमा कर रहे हैं उसे परमेष्टि कहा गया है। यह विश्व पांच तत्त्वों आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से मिलकर सृष्टि बनी हैं। इन पांच तत्त्वों से मिले वनस्पति, वृक्ष, नदी, पर्वत, सरीसृप, पशु, पक्षी ,सूर्य, चन्द्रमा नक्षत्र आदि इस सृष्टि के अंग हैं। सब मे एक तरह की आत्मा का निवास है। पिण्ड और ब्रह्माण्ड की में सामानुभूति देखना ही एकात्म मानववाद है। वनस्पति पेड़ पौधे पशु पक्षी और सभी मनुष्यों को पीड़ा न देना और परहित का भाव रखना चाहिये। उदार लोग सम्पूर्ण पृथ्वी को ही अपना परिवार मानते हैं। व्यक्ति परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व, सृष्टि और परमेष्ठी को मात्र अपना परिवार ही नही मानना अपितु सब मे अभेद देखना ही एकात्म मानववाद है। एकात्म मानवदर्शन में धर्म को जीवन का आधार माना गया है, लेकिन यहाँ धर्म का तात्पर्य धार्मिक अनुष्ठानों या रूढ़िवादी परंपराओं से नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से है। उपाध्याय जी ने राजनीति में नैतिकता और धर्म का समावेश जरूरी माना ताकि राजनीति केवल सत्ता और धन का खेल न बन जाए।एकात्म मानवदर्शन का महत्व इसलिए है क्योंकि यह एक ऐसी विचारधारा प्रदान करता है जो व्यक्ति, समाज, और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखकर एक समृद्ध और स्थिर समाज की रचना करने का प्रयास करता है। यह दर्शन आर्थिक विकास के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक विकास को भी महत्व देता है, जो आज के भौतिकतावादी और उपभोक्तावादी युग में एक महत्वपूर्ण संदेश है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन भारतीय संदर्भ में एक अद्वितीय सामाजिक और आर्थिक दर्शन है। यह केवल एक आर्थिक या राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच सामंजस्य और संतुलन को महत्व देता है। यह दर्शन भारतीय संस्कृति और जीवन के नैतिक मूल्यों पर आधारित एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो न केवल भौतिक समृद्धि बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी आवश्यक है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय दर्शन सामाजिक और आर्थिक न्याय पर आधारित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य समाज के सबसे गरीब और पिछड़े वर्गों का उत्थान करना है। “अंत्योदय” शब्द का शाब्दिक अर्थ है “अंतिम व्यक्ति का उदय” । इसका तात्पर्य है कि समाज में जो व्यक्ति सबसे अधिक गरीब, वंचित और पिछड़ा हुआ है, उसे प्राथमिकता देकर उसके उत्थान के लिए कार्य करना चाहिए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि समाज तब तक वास्तविक विकास नहीं कर सकता जब तक कि समाज के सबसे निचले तबके के लोगों की समस्याओं को हल नहीं किया जाता। उन्होंने भारतीय संस्कृति, नैतिकता, और सामाजिक मूल्यों पर आधारित एक ऐसी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था का समर्थन किया, जिसमें हर व्यक्ति का कल्याण हो, विशेष रूप से वे लोग जो उपेक्षित और शोषित हैं।

सबसे कमजोर व्यक्ति का उत्थान अंत्योदय दर्शन का केंद्रीय उद्देश्य समाज के सबसे कमजोर और निर्धन वर्ग के जीवन में सुधार करना है। उपाध्याय जी का मानना था कि समाज की प्रगति तब तक अधूरी है जब तक कि अंतिम व्यक्ति को उसका उचित अधिकार और जीवन स्तर न मिल जाए। समाज की सबसे निचली पंक्ति में खड़े व्यक्ति को ऊपर उठाना, सही मायने में समाज का विकास है। अंत्योदय का सिद्धांत यह कहता है कि सभी व्यक्तियों को समान अवसर और न्याय मिलना चाहिए, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म या सामाजिक स्थिति के हों। समाज में किसी प्रकार की असमानता या भेदभाव नहीं होना चाहिए। उपाध्याय जी के अनुसार, राज्य और समाज की यह जिम्मेदारी है कि वह सामाजिक, आर्थिक, और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों के उत्थान के लिए विशेष प्रयास करें।

अंत्योदय केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें व्यक्ति और समाज के समग्र विकास का लक्ष्य निहित है। इसमें शारीरिक, मानसिक, नैतिक, और आध्यात्मिक विकास पर जोर दिया गया है। उपाध्याय जी का मानना था कि विकास का मतलब केवल भौतिक सुख-सुविधाओं का बढ़ना नहीं है, बल्कि व्यक्ति के हर पहलू का विकास होना चाहिए।

अंत्योदय का महत्व इसलिए है क्योंकि यह समाज के सबसे वंचित और कमजोर वर्गों के प्रति करुणा और समर्पण की भावना को बढ़ावा देता है। यह विचारधारा उस समय विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाती है जब समाज में असमानता और भेदभाव की खाई बढ़ती जा रही हो। अंत्योदय न केवल आर्थिक सुधारों की बात करता है, बल्कि समाज में एक नैतिक और आध्यात्मिक चेतना जागृत करने का प्रयास करता है, जिससे हर व्यक्ति का जीवन समृद्ध हो सके। अंत्योदय पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एक क्रांतिकारी विचार है, जो समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान पर केंद्रित है। यह दर्शन बताता है कि समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब सबसे गरीब और वंचित वर्गों को सशक्त बनाया जाए और उन्हें समान अवसर और न्याय मिले। उपाध्याय जी का अंत्योदय दर्शन भारतीय समाज के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है, जो समाज के समग्र विकास और सामाजिक न्याय की दिशा में अग्रसर होने के लिए प्रेरित करता है।

11 फरवरी, 1968 का दिन देश के राजनीतिक इतिहास में एक बेहद दु:खद और काला दिन है। इसी दिन अचानक पंडित दीनदयाल जी की आकस्मिक मृत्यु हुई। वे मुगलसराय रेलवे स्टेशन (वर्तमान में पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन) के निकट चलती रेलगाड़ी में संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गयी। पंडित दीनदयाल जी के चाहने वाले और अनुयायी आज भी उस दुर्घटना से आहत हैं।

डा. बिपिन पांडेय

अध्यक्ष विश्व पुरोहित परिषद

Related posts

Leave a Comment